अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 22 मार्च 2025

ਅੰਗ : 680
धनासरी महला ५ ॥ जतन करै मानुख डहकावै ओहु अंतरजामी जानै ॥ पाप करे करि मूकरि पावै भेख करै निरबानै ॥१॥ जानत दूरि तुमहि प्रभ नेरि ॥ उत ताकै उत ते उत पेखै आवै लोभी फेरि ॥ रहाउ ॥ जब लगु तुटै नाही मन भरमा तब लगु मुकतु न कोई ॥ कहु नानक दइआल सुआमी संतु भगतु जनु सोई ॥२॥५॥३६॥
ਅਰਥ: हे भाई! (लालची मनुष्य) अनेकों यत्न करता है, लोगों को धोखा देता है, परन्तु सब के दिलों की जानने वाला परमात्मा (सब कुछ) जानता है। (बल्कि वह) त्यागियों वाले धार्मिक पहरावे बनाई रखता है, पाप करके (फिर उन पापों से) मुकर भी जाता है ॥१॥ हे प्रभू! तुम (सब जीवों के) नजदीक वसते हो, परन्तु (लालची पाखंडी मनुष्य) तुझे दूर (वसता) समझता है। लालची मनुष्य (लालच के) चक्कर में फंसा रहता है, (माया की खातिर) इधर उधर देखता है, उधर से उधर देखता है (उसका मन टिकता नहीं) ॥ रहाउ ॥ हे भाई! जब तक मनुष्य के मन की (माया वाली) भटकना दूर नहीं होती, यह (लालच के पंजों से) आज़ाद नहीं हो सकता। नानक जी कहते हैं – (पहरावों से भगत नहीं बन जाता) जिस मनुष्य पर मालिक-प्रभू दयावान होता है (और, उस को नाम की दात देता है) वही मनुष्य संत है भगत है ॥२॥५॥३६॥


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