अमृत ​​वेले का हुक्मनामा – 20 मार्च 2025

ਅੰਗ : 702
जैतसरी महला ५ ॥
आए अनिक जनम भ्रमि सरणी ॥
उधरु देह अंध कूप ते
लावहु अपुनी चरणी ॥१॥ रहाउ ॥
गिआनु धिआनु किछु करमु न जाना
नाहिन निरमल करणी ॥
साधसंगति कै अंचलि लावहु
बिखम नदी जाइ तरणी ॥१॥
सुख स्मपति माइआ रस मीठे
इह नही मन महि धरणी ॥
हरि दरसन त्रिपति नानक दास पावत
हरि नाम रंग आभरणी ॥२॥८॥१२॥

ਅਰਥ: जैतसरी पातशाही पांचवी
हे प्रभू! हम जीव कई जन्मों से भटकते हुए अब तेरी शरण आए हैं। हमारे शरीर को (माया के मोह के) घोर अंधेरे भरे कूएं से बचा ले, अपने चरणों में जोड़े रख।1। रहाउ।
हे प्रभू! मुझे आत्मिक जीवन की समझ नहीं, मेरी सुरति तेरे चरणों में जुड़ी नहीं रहती, मुझे कोई अच्छा काम करना नहीं आता, मेरा आचरण भी स्वच्छ नहीं है। हे प्रभू! मुझे साध-संगति के पल्ले से लगा दे, ता कि ये मुश्किल (संसार-) दरिया को तैरा जा सके।1।
हे नानक! दुनिया के सुख, धन, माया के मीठे स्वाद- परमात्मा के दास इन पदार्थों को (अपने) मन में नहीं बसाते। परमात्मा के दर्शनों से वे संतोष हासिल करते हैं, परमात्मा के नाम का प्यार ही उन (के जीवन) का गहना है।2।8।12।


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